
नन्ही भूरी गौरैया, बचपन की वो चहचहाहट,
आँगन में दाने चुगती, दिल को छू जाती थी।
पर अब… उसकी आवाज़ सूनी पड़ गई।
कंक्रीट के जंगलों ने घर छीन लिया,
कीटनाशकों ने भोजन छीन लिया,
हमारी लापरवाही ने उसे खो दिया। वो सिर्फ पक्षी नहीं, हमारी यादों का टुकड़ा है,
सुबह की पहली किरण, जीवन की मधुर धुन।
उसकी चुप्पी में हमारा अकेलापन छिपा है। फिर भी आंसू नहीं, उम्मीद है। अब से भी अगर हम सब सामूहिक प्रयास करे, उनके लिए दाना-पानी रखें, पेड़ काटे नही लगाये तो हालात बदल सकते हैं । नन्हे पंखों को फिर घर में बसाएँगे। क्योंकि गौरैया की चहचहाहट लौटी, तो हमारी सुबहें फिर जीवंत होंगी।



















