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झारखंड में भाजपा की शहरी जमीन खिसकी: 48 निकायों के नतीजों ने बदला सियासी समीकरण

नैयर आजम

रांची/कोलकाता: देवघर के नवनिर्वाचित मेयर रवि राउत ने आज मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मुलाकात की. रवि राउत ने भाजपा सांसद निशिकांत दुबे के गढ़ में भाजपा समर्थित उम्मीदवार रीता चौरसिया को चुनाव में हराया है. इसलिए झारखंड मुक्ति मोर्चा समर्थित उम्मीदवार रवि राउत की जीत की खूब चर्चा हो रही है. झारखंड में 23 फरवरी को हुए 48 नगर निकायों के चुनाव के परिणाम अब सामने आ चुके हैं। इन नतीजों से एक अहम राजनीतिक संकेत मिला है—राज्य के शहरी इलाकों में भी भाजपा की पकड़ पहले जैसी मजबूत नहीं रह गई है। खासकर बड़े नगर निगमों के परिणामों ने यह दिखाया कि मुकाबला अब एकतरफा नहीं रहा। नौ बड़े नगर निगमों में हुए मेयर चुनाव में भाजपा समर्थित उम्मीदवार सिर्फ तीन जगह ही जीत दर्ज कर सके। तीन जगह निर्दलीय उम्मीदवार जीते, दो जगह झामुमो समर्थित और एक जगह कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार ने बाजी मारी। यह भी महत्वपूर्ण है कि भाजपा के खिलाफ कोई औपचारिक गठबंधन चुनाव नहीं लड़ रहा था, बल्कि गठबंधन की पार्टियां अलग-अलग मैदान में थीं। इसके बावजूद भाजपा को उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली।देवघर में भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने पूरी ताकत लगाई थी, फिर भी मेयर पद पर भाजपा को जीत नहीं मिली। यहां रवि रावत मेयर चुने गए और उनकी मां वार्ड पार्षद बनीं। इससे साफ हुआ कि वार्ड स्तर से लेकर मेयर पद तक भाजपा अपने प्रतिद्वंद्वियों को रोकने में सफल नहीं रही। इस बार चुनाव ईवीएम की बजाय बैलट पेपर से कराए गए। लंबे समय बाद बैलट पेपर से मतदान हुआ, जिससे कुछ जगह मतगणना में देरी जरूर हुई, लेकिन ज्यादातर उम्मीदवार इस प्रक्रिया से संतुष्ट नजर आए। करीब 44 लाख मतदाता इस चुनाव में शामिल हुए, जिनमें 21 लाख से ज्यादा महिलाएं थीं। 48 शहरी निकायों में कुल 1087 पदों के लिए मतदान हुआ। महिलाओं की बड़ी भागीदारी भी इन चुनावों की एक अहम विशेषता रही।कुल मिलाकर, झारखंड के शहरी निकाय चुनावों ने यह संकेत दिया है कि राज्य की राजनीति में मुकाबला अब और ज्यादा खुला हो गया है। भाजपा के लिए यह नतीजे चेतावनी की तरह हैं, जबकि झामुमो, कांग्रेस और निर्दलीयों के लिए यह मनोबल बढ़ाने वाला परिणाम माना जा रहा है। आने वाले समय में इसका असर राज्य की बड़ी राजनीतिक लड़ाइयों पर भी दिख सकता है।

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