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एक्सप्रेसवे की चमक, गड्ढों की हकीकत: विकास के पोस्टर और धरातल की दरारें

Sanjay Singh
सरकारी दस्तावेज़ पढ़िए तो लगता है कि उत्तर प्रदेश अब केवल एक राज्य नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा लॉजिस्टिक्स हब बनने की दहलीज़ पर खड़ा है। जल, थल और नभ की अभूतपूर्व कनेक्टिविटी, दर्जनों एक्सप्रेसवे, फ्रेट कॉरिडोर, मल्टी-मॉडल टर्मिनल, औद्योगिक कॉरिडोर, फ्रेट विलेज और हजारों हेक्टेयर औद्योगिक भूमि—ऐसा चित्र खींचा जाता है मानो निवेशकों की कतारें प्रदेश की सीमाओं पर खड़ी हों।
लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास केवल सरकारी पुस्तिकाओं और विज्ञापनों में हो रहा है, या धरातल पर भी दिखाई देता है?
विडंबना यह है कि जिन सड़कों और एक्सप्रेसवे को विकास का प्रतीक बताया जा रहा है, उनमें से कई जगहों पर पहली ही बरसात ने उनकी गुणवत्ता की पोल खोल दी। कहीं सड़क धंस गई, कहीं डामर उखड़ गया, कहीं पुलिया के किनारे टूट गए, तो कहीं गड्ढे इतने गहरे हो गए कि लोगों को यह समझना मुश्किल हो गया कि वे सड़क पर चल रहे हैं या किसी अधूरे निर्माण स्थल से गुजर रहे हैं।
सरकार कहती है कि लॉजिस्टिक लागत कम हो रही है। जनता पूछ रही है कि क्या हर साल बनने और फिर टूटने वाली सड़कों की मरम्मत पर होने वाला खर्च भी उसी लागत का हिस्सा है?
सरकार दावा करती है कि निवेश का माहौल मजबूत हुआ है। लेकिन निवेश केवल एमओयू (MoU) और निवेश सम्मेलन के मंचों पर घोषित राशि से नहीं मापा जाता। असली निवेश वह होता है जो कारखानों की चिमनियों से धुआँ बनकर निकले, युवाओं को रोजगार दे और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति दे। यदि करोड़ों-अरबों रुपये के निवेश के दावे ज़मीन पर उद्योगों, रोजगार और उत्पादन में नहीं बदलते, तो जनता के मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
यह भी सच है कि एक्सप्रेसवे बनाना बड़ी उपलब्धि है। लेकिन एक्सप्रेसवे के दोनों ओर उद्योग, वेयरहाउस, लॉजिस्टिक पार्क और रोजगार के अवसर खड़े करना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है। यदि सड़कें केवल वाहनों के गुजरने का माध्यम बनकर रह जाएँ और उनके किनारे उद्योग न बसें, तो विकास अधूरा ही माना जाएगा।
सरकार को यह भी समझना होगा कि चमकदार विज्ञापन और बड़े-बड़े दावे जनता की आँखों को कुछ समय के लिए आकर्षित कर सकते हैं, लेकिन टूटी सड़कें, जलभराव, घटिया निर्माण और अधूरे प्रोजेक्ट रोज़ जनता की ज़िंदगी से टकराते हैं। धरातल की सच्चाई किसी भी प्रचार अभियान से अधिक प्रभावशाली होती है।
उत्तर प्रदेश को वास्तव में “उत्तम प्रदेश” बनाना है तो केवल एक्सप्रेसवे की लंबाई गिनने से काम नहीं चलेगा। गुणवत्ता, जवाबदेही, पारदर्शिता और समयबद्ध औद्योगिक विकास सुनिश्चित करना होगा। वरना इतिहास यही लिखेगा कि राज्य में विकास के सबसे सुंदर पोस्टर लगे थे, लेकिन उन पोस्टरों तक पहुँचने वाली सड़कें ही गड्ढों में खो गई थीं।
सरकार कहती है—”जल, थल और नभ की अभूतपूर्व कनेक्टिविटी।”जनता पूछती है—”पहले सड़क तो ऐसी बना दीजिए कि पहली बरसात में घर से बाज़ार तक की कनेक्टिविटी बनी रहे।”

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