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एआई से संभव हुआ ऑपरेशन से पहले जोखिम का सटीक आकलन, मरीजों की सुरक्षा कई गुना बढ़ी

संजय कुुमार सिंह

लखनऊ, : अब ऑपरेशन से पहले बेहोशी (एनस्थीसिया) देना और भी सुरक्षित हो गया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित तकनीक की मदद से मरीज की सांस की नली में सिकुड़न का सटीक आकलन किया जा सकता है। साथ ही ऑक्सीजन के लिए डाली जाने वाली नली को सही स्थान पर बिना जटिलता के पहुंचाकर सुरक्षित तरीके से सांस दी जा सकती है। आईसीयू में वेंटिलेटर पर भर्ती मरीजों का इलाज भी अब अधिक सुरक्षित हो सकेगा। ये जानकारी किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) की कुलपति डॉ. सोनिया नित्यानंद ने शनिवार को एक होटल में आयोजित सेमिनार में दी।एआईडीएए लखनऊ शाखा ने ‘एयरवे मैनेजमेंट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एवं सिमुलेशन की भूमिका’ विषय पर सेमिनार का आयोजन किया। इसमें कुलपति ने कहा कि एआई एयरवे मैनेजमेंट को अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनाने में अहम भूमिका निभा रही है। ऑपरेशन थिएटर और इमरजेंसी स्थितियों में एआई का उपयोग मरीज की सुरक्षा को कई गुना बढ़ा सकता है।एनस्थीसिया विभाग के डॉ. तन्मय तिवारी ने बताया कि एयरवे मैनेजमेंट, यानी सांस के रास्ते को सुरक्षित रखना, बेहोशी और आपातकालीन चिकित्सा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। एआई से युक्त मॉनिटरिंग सिस्टम मरीज की दिल की धड़कन, ऑक्सीजन स्तर, ब्लड प्रेशर और श्वसन दर जैसे मानकों का लगातार विश्लेषण करते हैं। किसी भी पैरामीटर में असामान्य बदलाव होने पर सिस्टम तुरंत डॉक्टर को अलर्ट कर देता है। उन्होंने बताया कि नाक, मुंह या गले के रास्ते नली डालते समय चोट और रक्तस्राव का खतरा रहता है, जिसे नई तकनीक से काफी हद तक कम किया जा सकता है। डॉ.तन्मय ने स्पष्ट किया कि एआई डॉक्टरों का विकल्प नहीं, बल्कि उनकी निर्णय क्षमता को सशक्त बनाने का माध्यम है। एआई आधारित निर्णय सहायता प्रणाली और टेली-सपोर्ट तकनीक से ग्रामीण एवं दूरदराज क्षेत्रों में भी उच्च गुणवत्ता वाली एनेस्थीसिया एवं एयरवे सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं।

दवा की सही डोज तय करने में सहायक

एनस्थीसिया विभागाध्यक्ष डॉ. मोनिका कोहली ने कहा कि एआई तकनीक मरीज की उम्र, वजन, स्वास्थ्य स्थिति और सर्जरी की प्रकृति के आधार पर एनेस्थीसिया दवाओं की उपयुक्त मात्रा सुझाने में मददगार है। इससे ओवरडोज या अंडरडोज का खतरा कम होता है। हालांकि अंतिम निर्णय डॉक्टर ही लेते हैं।

सिमुलेशन आधारित प्रशिक्षण जरूरी

टाटा मेमोरियल अस्पताल के डॉ. सोहन सोलंकी ने सिमुलेशन आधारित प्रशिक्षण की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि हाई-फिडेलिटी सिमुलेशन लैब में जटिल परिस्थितियों का अभ्यास कर डॉक्टर वास्तविक ऑपरेशन थिएटर में होने वाली संभावित गलतियों को कम कर सकते हैं। इससे टीमवर्क, संचार कौशल और संकट प्रबंधन क्षमता भी बेहतर होती है। कार्यक्रम में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के डॉ. विशाल देव सहित कई विशेषज्ञ मौजूद रहे।

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