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विश्व रेडियो दिवस: 15 सालों से पहाड़ की आवाज बना ‘Radio Khushi स्थानीय प्रतिभाओं को दी नई पहचान

देहरादून ब्यूरों 13 फरवरी को मनाया जाने वाला विश्व रेडियो दिवस केवल एक प्रसारण माध्यम का उत्सव भर नहीं, बल्कि उन आवाजों का सम्मान है, जो दूर-दराज तक उम्मीद, जानकारी और अवसर पहुंचाती हैं।

उत्तराखंड के मसूरी से प्रसारित होने वाला सामुदायिक रेडियो ‘खुशी’ 90.4 एफएम इसी बदलाव का सशक्त उदाहरण है। उत्तराखंड के पहले सामुदायिक रेडियो स्टेशन के रूप में स्थापित इस मंच ने न केवल स्थानीय मुद्दों को स्वर दिया, बल्कि शिक्षा, जागरूकता और रोजगार के नए रास्ते भी खोले।वर्ष 2010 में शुरू हुए रेडियो खुशी की परिकल्पना इस सोच के साथ की गई थी कि पहाड़ की आवाज़ पहाड़ के लोगों तक पहुंचे। मनोरंजन के साथ ज्ञानवर्धक और सामाजिक सरोकारों से जुड़े कार्यक्रमों ने इसे जल्द ही स्थानीय समाज का भरोसेमंद मंच बना दिया।शुरुआती दौर में श्रोताओं की संख्या सीमित थी, लेकिन बच्चों की शिक्षा, महिलाओं के स्वास्थ्य, स्थानीय संस्कृति, बोली और सामाजिक जागरूकता से जुड़े कार्यक्रमों ने लोगों को जोड़ना शुरू किया। एक कार्यक्रम से प्रेरित होकर जरूरतमंद बच्चों का स्कूल में दाखिला कराया जाना इस रेडियो की सामाजिक प्रभावशीलता का प्रमाण है। इससे साबित होता है कि रेडियो केवल ध्वनि नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी है।

मसूरी का रेडियो खुशी इस बात का प्रमाण है कि जब स्थानीय पहल को समर्पण और दूरदृष्टि का साथ मिलता है, तो वह पूरे क्षेत्र की आवाज बनकर उभरती है और कई जिंदगियों की दिशा बदल देती है।

नुपुर बताती है कि रेडियो के माध्‍यम से वह शिक्षा से संबंधित कार्यक्रम जी लो जिंदगी व आवाजें हैं लगातार चला रही हैं। उनकी कोशिश ज्‍यादा से ज्‍यादा बच्‍चों को स्‍कूल से जोडने की है। अब तक वह 150 से अधिक बच्‍चों को स्‍कूल से जोड चुकी हैं।आज यह रेडियो स्टेशन देहरादून और मसूरी के अलावा हरिद्वार और बिजनौर तक सुना जाता है। पहाड़ की महिलाओं की पीड़ा, युवाओं की आकांक्षाएं, संस्कृति और संस्कार जैसे विषयों को केंद्र में रखकर तैयार किए गए कार्यक्रमों ने इसे जन-जन का मंच बना दिया है। इससे पता चलता है कि रेडियो आज भी सबसे सुलभ और प्रभावी माध्यम है, जो इंटरनेट या टीवी की पहुंच से दूर क्षेत्रों में भी संवाद का पुल बनता है।

नुपुर बताती हैं कि रेडियो का आनलाइन प्‍लेटफार्म नहीं है, इसलिए उन्‍हें श्रोताओं की संख्‍या का अनुमान नहीं है। श्रोताओं के फोन व मेल के आधार पर यही जानकारी है कि देहरादून-मसूरी के अलावा हरिद्वार व बिजनौर तक के श्रोताओं को जोड़े हुए है।रेडियो खुशी की एक और बड़ी उपलब्धि स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षण देकर उन्हें रोजगार की राह दिखाना है। इस सामुदायिक मंच ने केवल कार्यक्रम प्रसारित नहीं किए, बल्कि नई पीढ़ी को माइक के पीछे खड़ा होने का आत्मविश्वास भी दिया।

अब तक लगभग सौ युवाओं को प्रशिक्षण दिया जा चुका है, जिनमें से आरजे अखिल, आरजे देवांगना सहित 15 से अधिक युवा विभिन्न कमर्शियल रेडियो स्टेशनों में अपनी पहचान बना चुके हैं। पहाड़ के युवाओं के लिए यह मंच करियर निर्माण की प्रयोगशाला साबित हुआ है।

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