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भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI)  द्वारा बुंदेलखंड क्रेटॉन की खनिज संभावनाओं पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन

लखनऊ वार्ता – न्यूज/लखनऊ, 20 अप्रैल 2026: भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने आज लखनऊ में “बुंदेलखंड क्रेटॉन की खनिज संभावनाएं: महत्वपूर्ण खनिजों पर विशेष फोकस” विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया। कार्यशाला का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ, जिसमें मुख्य अतिथि एवं GSI के महानिदेशक असित साहा वर्चुअल माध्यम से शामिल हुए। इस अवसर पर जोयेश बागची, राजिन्द्र कुमार सहित विभिन्न हितधारकों, नीति-निर्माताओं, आईआईटी /विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और देशभर के शिक्षाविदों ने भी वर्चुअल माध्यम से भाग लिया।

यह कार्यशाला बुंदेलखंड क्रेटॉन की खनिज संभावनाओं पर विचार-विमर्श, अनुभवों के आदान-प्रदान और गहन चर्चा का एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुई। इसमें भारत की भविष्य की संसाधन सुरक्षा के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण एवं रणनीतिक खनिजों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया। इस दौरान विशेषज्ञों ने क्रेटॉन के टेक्टोनिक विकास, भू-वैज्ञानिक ढांचे और धात्विक संभावनाओं पर विस्तृत चर्चा की।

अपने संबोधन में असित साहा ने बुंदेलखंड क्रेटॉन को महत्वपूर्ण खनिजों की खोज के लिए एक प्रमुख क्षेत्र बताया और इसकी अपार संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने राष्ट्रीय क्रिटिकल मिनरल मिशन के महत्व को रेखांकित करते हुए उन्नत तकनीकों—जैसे आइसोटोपिक एवं उच्च-सटीक विश्लेषण—के उपयोग से संभावित भंडारों की पहचान के प्रयासों को तेज करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने GSI और शैक्षणिक संस्थानों के बीच समन्वित एवं दूरदर्शी रणनीति विकसित करने का आह्वान किया, जिससे छिपे एवं गहरे खनिज भंडारों की खोज के लिए एक मजबूत कार्ययोजना तैयार की जा सके।
जोयेश बागची ने अपने संबोधन में कहा कि बुंदेलखंड क्रेटॉन एक ओर चुनौतीपूर्ण है, वहीं दूसरी ओर अत्यंत संभावनाशील क्षेत्र भी है। उन्होंने इसे भू-वैज्ञानिक दृष्टि से जटिल, लेकिन महत्वपूर्ण एवं दुर्लभ मृदा तत्व (REE) खनिजों के लिए समृद्ध क्षेत्र बताया। उन्होंने वैज्ञानिक, समेकित एवं तकनीक-आधारित अन्वेषण पद्धति अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया, जिससे संभावित क्षेत्रों की पहचान कर इसकी पूर्ण खनिज क्षमता को सामने लाया जा सके।

राजिन्द्र कुमार ने GSI के उत्तरी क्षेत्र की उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि अब तक 32 भू-वैज्ञानिक रिपोर्ट, 19 भू-वैज्ञानिक ज्ञापन और 5 एक्सप्लोरेशन लाइसेंस ब्लॉक्स नीलामी के लिए सौंपे जा चुके हैं। इन कार्यों में वैनाडियम, आयरन, जिरकोनियम, पोटाश, लिथियम और बेस मेटल्स जैसे प्रमुख खनिज शामिल हैं। उन्होंने क्षेत्र में चल रही विस्तृत भू-मानचित्रण, भू-भौतिकीय सर्वेक्षण और भू-रासायनिक जांच गतिविधियों का भी उल्लेख किया और महत्वपूर्ण एवं दुर्लभ मृदा तत्व (REE) खनिजों की खोज में उत्तरी क्षेत्र की सक्रिय भूमिका को रेखांकित किया।
कार्यशाला के दौरान विभिन्न प्रकाशनों—जिनमें कार्यशाला का सार-संग्रह तथा “Miscellaneous Publication No. 30” (हिमाचल प्रदेश की भू-वैज्ञानिक संरचना एवं खनिज संभावनाओं पर आधारित)—का विमोचन भी किया गया।
तकनीकी सत्रों में बुंदेलखंड क्रेटॉन के टेक्टोनिक विकास, धात्विक ढांचे और खनिज प्रणालियों का व्यापक वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया। चर्चाओं में यह भी रेखांकित किया गया कि संरचनात्मक, भू-रासायनिक और भू-भौतिकीय आंकड़ों के समेकन से अन्वेषण रणनीतियों को और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है तथा छिपे खनिज भंडारों की पहचान संभव है।
Geological Survey of India के बारे में
Geological Survey of India (GSI) की स्थापना वर्ष 1851 में मुख्य रूप से रेलवे के लिए कोयला भंडारों की खोज हेतु की गई थी। समय के साथ GSI देश में भू-विज्ञान संबंधी जानकारी का प्रमुख भंडार बन गया है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक प्रतिष्ठित भू-वैज्ञानिक संगठन के रूप में स्थापित हुआ है।
GSI का मुख्य कार्य राष्ट्रीय भू-विज्ञान संबंधी डेटा का निर्माण एवं अद्यतन करना तथा खनिज संसाधनों का आकलन करना है। यह कार्य भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण, वायवीय एवं समुद्री सर्वेक्षण, खनिज अन्वेषण, बहु-विषयक अध्ययन, प्राकृतिक आपदाओं के विश्लेषण और अनुसंधान के माध्यम से किया जाता है।
यह संगठन नीति-निर्माण, वाणिज्यिक और सामाजिक-आर्थिक आवश्यकताओं के लिए निष्पक्ष एवं अद्यतन भू-वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराता है तथा भारत और इसके अपतटीय क्षेत्रों की सतह एवं उपसतह की भू-वैज्ञानिक प्रक्रियाओं का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण भी करता है।
कोलकाता मुख्यालय के साथ GSI के छह क्षेत्रीय कार्यालय—लखनऊ, जयपुर, नागपुर, हैदराबाद, शिलांग और कोलकाता—स्थित हैं तथा लगभग सभी राज्यों में इसके इकाई कार्यालय मौजूद हैं। यह भारत सरकार के खान मंत्रालय के अधीन एक संबद्ध कार्यालय है।

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