
आज फरवरी की पहली तारीख है, यानी आम बजट का दिन। एक समय था, जब अखबार अपने पाठको को आम बजट का अर्थ समझाया करते थे, लेकिन बदलते वक्त के साथ भारतीयों की आर्थिक समझ गहरी हुई है। अब वे बजट से छप्परफाड़ उम्मीदें रखने लगे हैं। इस बार अधिकांश भारतीय क्या चाहते हैं? उन्हें पूरा करने के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमणा के समक्ष क्या चुनौतियां हैं? आइए, इन्हें सिलसिलेवार तरीके से समझने की कोशिश करते हैं।
वेतनभोगियों को उम्मीद है कि आयकर का ‘स्टैंडर्ड डिडक्शन 75 हजार रुपये से बढ़ाकर कम से कम एक लाख कर दिया जाए। यही नहीं, धारा 87 एके तहत 12 लाख रुपये की सीमा को 15 लाख करने की भी मांग उठ रही है। यह तब है, जब केंद्र सरकार ने पिछले ही साल इसे सात लाख रुपये से बढ़ाकर 12 लाख किया था। देश की जीडीपी में महत्वपूर्ण योगदान करने वाले निचले और मझोले दर्जे के वेतनभोगी महंगाई के सर्वाधिक शिकार होते हैं। पिछले त्योहारी मौसम में जीएसटी की दरों में कटौती कर उन्हें राहत ‘ पहुंचाई गई थी। इससे अमेरिकी टैरिफ से हकबकाए बाजारों में उछाल भी देखा गया था, लेकिन बदलती विश्व-व्यवस्था ने नए खतरे पैदा कर दिए हैं।
इसकी वजह से सोना और चांदी तो आसमान छू ही रहे हैं, लेकिन तमाम उत्पादों के काम में आने वाले तांब और अन्य घातुओं ने भी छलांग मारनी शुरू कर दी हैं। यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि चांदी का प्रयोग आभूषणों के साथ तमाम औद्योगिक उत्पादों में होता है। इन धातुओं की कीमत बढ़ने का सीधा असर ऑटो, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य आवश्यक वस्तुओं पर पड़ने की आशंका है। सवाल उठ रहा है कि क्या इनके आयात पर लागू होने वाले मौजूदा शुल्कों में कोई कटौती की जाएगी ?
इनकी बढ़ती कीमतों ने देश पर सर्वाधिक रोजगार सृजित करने वाले छोटे और मझोले उद्योगों को कई झमेलों में फंसा दिया है। उनकी उत्पादन लागत में बढ़ोतरी हो रही है, जिससे मुनाफे में कमी और ‘वर्किंग कैपिटल’ का संकट सिर उठाता नजर आता है। इसका असर उनकी उत्पादन क्षमता पर पड़ता है और उनको रोजगार सूजन क्षमता बाधित होती है। यह क्षेत्र देश में सर्वाधिक रोजगार रचता है। इसकी सुस्ती मतलब ‘जॉब मार्केट’ में मुर्दनी।
आजकल : लोहा, इस्पात और एल्युमिनियम जैसी धातुओं की महंगाई का असर आवासीय क्षेत्र पर भी पड़ता है। आम लोगों की शिकायत है कि एक बसेरा बनाना या खरीदना अब उनकी पहुंच से परे होता जा रहा है। दिल्ली, एनसीआर, पुणे, मुंबई और अन्य महानगरों में तो पहले ही बढ़ती आवास दरों ने निम्न और मध्यम वर्ग के लोगों के नौड़ स्वप्न पर ग्रहण लगा दिया था, अब इसका असर छोटे शहरों पर भी पड़ना शुरू हो गया है। यही वजह है कि एक बड़ा तबका आवासीय ऋण पर छूट के साथ बेहतर कर-लाभ भी अर्जित करना चाहता है। अस्पतालों में महंगा होता इलाज उनकी चिंता का दूसरा सबब है। लोगों का मानना है कि बीमा दरों पर जीएसटी की छूट के बावजूद इसका लाभ आम भारतीय तक नहीं पहुंच रहा है। स्वास्थ्य बीमा योजनाओं की दरों पर ‘कैपिंग’ की मांग पुरानी है।
इसके अलावा दो शाश्वत उम्मीदें हैं, तेजी से रोजगार सृजन और महंगाई पर लगाम। जाहिर है, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के समक्ष यह बजट भी चुनौतियों का नया जखीरा लेकर आया है।
इसमें पहले नंबर पर है, चौतरफा संतुलन साधना। राजकोषीय घाटे और ऋण को कैसे कम किया जाए ? यूरोपीय संघ के साथ हुए ऐतिहासिक समझौते के पालन के लिए जमीन कैसे तैयार की जाए? अमेरिका ने टैरिफ का जो दबाव बनाया है, उससे कैसे निपटा जाए? तेजी से बदलती भू-राजनीति और
बदलती अर्थव्यवस्था के बीच भारत को और मजबूती से कैसे उभारा जाए? लघु एवं मध्यम वर्ग के लिए रास्ता हमवार कैसे किया जाए? जलवायु परिवर्तन से होने वाले जोखिम के लिए बजट में क्या प्रावधान किए जाएं? ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए कौन से नए उपाय खोजे जाएं, आदि-इत्यादि।
जो नहीं जानते, उन्हें बता दूं। आज निर्मला सीतारमण लगातार नौवां बजट पेश कर ‘नया रिकॉर्ड बनाने जा रही हैं। अभी तक सिर्फ मोरारजी देसाई को दस बार बजट पेश करने का सौभाग्य मिला है, लेकिन उन्हें अंतरालों का सामना करना पड़ा। श्रीमती सीतारमण को मोदी सरकार की स्थिरता ने यह अवसर प्रदान किया है। इस निरंतरता का लाभ उन्होंने आयकर सुधार, नई टैक्स व्यवस्था और कैपिटल गेन्स टैक्स में बदलाव करके उठाया। काले धन का प्रवाह रोकने के लिए वह क्रिप्टो करेंसी को कर-दायरे में लाई। उनके कार्यकाल में ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर’ के लिए अभूतपूर्व धनराशि आवंटित की गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत’ के विजन को इस धनराशि का असर तेजी से पनपते राजमार्गों, बहते शहरीकरण, नए हवाई अर्को, रेलपथ के विस्तार के साथ आधुनिकीकरण के तमाम मानकों पर दिखता है। मोदी सरकार हर हाल में इस सुखद सफर को जारी रखना चाहेगी, लेकिन दुनिया के संकेत चुनौतियां जनते हैं। इस साल दुनिया की अर्थव्यवस्था में सुस्ती के संकेत हैं। ऐसे में, बढ़त जारी रखने के लिए तमाम उपायों की दरकार है।



















