
पहाड़ों पर जब पीतल के बर्तनों से मसालों की ख़ुशबू उठती है, तो समझो ‘धाम’ की पंगत सज रही है। यह महज़ खाना नहीं, बल्कि पवित्र भूमि में सामूहिक उत्सवों की परंपरा की अनूठी झलक लिए एक भोजन संस्कार भी है।
शताब्दियों पूर्व जब हिमाचल की ठंडी वादियों में सामूहिक उत्सवों की परंपरा शुरू हुई, तब ‘बोटी’ (पारंपरिक रसोइयों) ने स्थानीय सामग्री और शुद्धता के मेल से एक अद्भुत भोज तैयार किया, जिसे ‘धाम’ भोजन संस्कार कहा गया। पीतल के बर्तनों (चरौटी) में धीमी आंच पर पकने वाला यह खाना स्वयं में स्वाद की मिठास के साथ रिश्तों में भी प्यार घोल जाता है। लकड़ी की धीमी आंच पर पीतल के बड़े बर्तनों में बनाया जाने वाला यह भोजन हिमाचल के कांगड़ा, मंडी और चम्बा क्षेत्रों में आज भी अपनी पहचान बनाए हुए है।
सात्विकता और स्वाद का संगम
धाम की सबसे बड़ी विशेषता इसका पूर्णतः शाकाहारी और सात्विक होना है। इसमें प्याज़, लहसुन या अदरक का प्रयोग नहीं किया जाता।
परोसने का भी एक नियम होता है। टोर (साल) के बड़े पत्तों पर इसे परोसते हैं। पहले आपको पानी दिया जाता है ताकि आप थोड़ा पानी छिड़ककर इस पत्तल को धो सकें। फिर इस पर चावल परोसा जाता है, फिर सेपू बड़ी (कुछ क्षेत्रों में माद्रा यानी राजमा) से शुरुआत होती है। इसके बाद 3-4 मौसमी सब्ज़ियां क्रम से परोसते हैं। कद्दू का खट्टा और बदाने का मीठा परोसा जाता है।
इस दौरान, आप चाहें तो कितने बार भी चावल ले सकते हैं, पर इसके बाद आता है रोचक हिस्सा, अंत में माश दाल और कढ़ी परोसी जाती है जिसका मतलब होता है कि पंगत पूरी हुई।
कुछ ज़िलों में पंगत का अंत मीठा भात परोस कर किया जाता है, जिसके बाद आप चावल नहीं मांग सकते। एक और बात, ये पूरा खाना हाथ से ही खाना होता है।
पंगत और पत्तल का अनुशासन
धाम केवल स्वाद का साधन नहीं है, बल्कि सामाजिक समरसता का प्रतीक है। ज़मीन पर बिछी टाट की लंबी कतारों में बैठकर लोग पत्तलों पर भोजन करते हैं। यहां अमीर-ग़रीब का भेद मिट जाता है और अनुशासन का पालन सर्वोपरि होता है। मिट्टी की सौंधी ख़ुशबू के बीच पत्तों पर परोसा गया गर्मा-गर्म खाना सादगी और मर्यादा का सुस्वादु मेल लगता है।
















